BYNAVNATH MISHRA

हाल ही में प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश के नाम पर पुणे पुलिस ने नक्सलियों से संबंध के शक में कुछ लोगों को(सुधा भरद्वाज, गौतम नौलखा आदि) को गिरफ्तार किया। आन्तरिक सुरक्षा की दृष्टि से एक यह सराहनीय कदम है किंतु यहाँ प्रश्न है कि एक ऐसे बौद्धिक लोग नक्सलवाद की तरफ प्रेरित क्यों हैं? देश के भीतर जो सांस्कृतिक टकराव चल रहा है वह नक्सलवाद और राष्ट्रवाद के बीच का है या नक्सलवाद(मार्क्सवाद) और पूंजीवाद के?

आरएसएस जोकि राष्ट्रवादी संगठन है वह नक्सलवाद के चंगुल से गरीबों को बचाने और खुद से जोड़ने में कितना सफल होगा? यदि नक्सलवाद से देश को मुक्ति मिलती है तो देश में संघ के राष्ट्रवाद की स्थापना होगी? या राष्ट्रवाद का चोला ओढ़े पूंजीवादी प्रवृतियों की पोषक बीजेपी के अवसरवाद की जिसकी पूंजीवाद के संरक्षण की प्रवृतियां किसी भी रुप में कांग्रेस से अलग नहीं कही जा सकती।

यदि इन सबका उत्तर खोजा जाए तो भविष्य की राहें काफी कठिन दिखाई देती हैं उसके लिए राष्ट्रवाद की पोषक आरएसएस को एक साथ दो मोर्चे की लड़ाई लड़नी होगी।

 पहले मोर्चे पर उसे गरीबों के बीच जाकर उन्हें खुद से जोड़ना होगा जैसा कि केरल में बाढ़ राहत के दौरान कर रही है। साथ ही अल्पसंख्यकों को जोड़ना होगा क्योंकि चाहे इसाई हो या मुस्लिम या बौद्ध सभी हमारी राष्ट्रीय संस्कृति का ही हिस्सा हैं। कुछ भले ही विदेशी हों।

अंबेडकर के इस सिद्धांत को दलितों तक पहुंचाना होगा कि दलित वैदिक समाज का ही हिस्सा हैं जैसा कि अंबेडकर ने अपने लेख “who were shudras and how they became untouchable” में कहा था।

दूसरी लड़ाई आरएसएस की आंतरिक मोर्चे पर खुद की राजनीतिक अभिव्यक्ति बीजेपी से लड़नी होगी। जोकि संघ के सहारे सत्ता तो हासिल करती है किंतु सत्ता प्राप्ति के बाद कांग्रेस की तरह पूंजीवाद की गोद में जा बैठी है और स्वदेशी भूल एफडीआई का समर्थन करती नजर आती है तथा गोदी मीडिया राष्ट्रवाद का चोला और पूंजीवाद के पक्ष में आम जनमानस को भ्रमित करती है।

अंततः संघ को राम राज्य की तरफ बढ़ना ही होगा (गंगा-जमुना तहजीब की दिशा में), हमें माओ के समानता या एडम स्मिथ की स्वतंत्रता की आवश्यकता नहीं है। हमें “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिंदुभूमे सुखं वर्धितोह म” के विचारों वाले संघ के भारत की आवश्यकता है तभी राष्ट्रवाद की वास्तविक स्थापना संभव हो पाएगी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)लेखक स्वतंत्र विचारक हैं तथा इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यवहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ‘द फायर ‘ उत्तरदाई नहीं है। इस आलेख में लेखक के विचारों को ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है।

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