photo: Ravish Kumar/ fb page

BYRAVISH KUMAR


येल यूनिवर्सिटी का अपना अख़बार है। इस अख़बार को यूनिवर्सिटी के ही छात्र चलाते हैं और पूरी स्वायत्ता के साथ। यहाँ पाँच दिन रहा लेकिन हर दिन पहली ख़बर येल को चुनौती देने वाली रही। इस अख़बार में येल की नीतियों की गंभीर आलोचना छपती है।

यह बात इसलिए बता रहा हूँ कि हमारे देश में शायद ही किसी शिक्षण संस्थान का अपना कोई अख़बार होगा जिसमें उसी की आलोचना छप जाए। वैसे भारत विश्व गुरू है।

क्लासों में दस लाख से अधिक गुरू नहीं फिर भी विश्व गुरू बन गया है। आलोचना तो हो ही नहीं सकती क्योंकि यूजीसी कहता है कि सरकार की आलोचना न होगी। इस अख़बार को पढ़ें, बहुत कुछ सीखेंगे।

आपके लिए इसके पहले पन्ने की तीन तस्वीरें दे रहा हूँ। एक में है कि यौन उत्पीड़न के आरोपों पर येल चुप है तो बग़ल एशियन-अमरीकी छात्रों के आरक्षण को मिल रहे समर्थन की ख़बर है।

यहाँ तक कि कावानॉव के ख़िलाफ़ गवाही देने वाली प्रोफेसर क्रिश्टीन ब्लेस्सी का बयान छपा है कि हिप्पोक्रेट कैम्पस की न मिटने वाली स्याही उसकी हँसी से झलक रही है। ब्लेस्सी के बयान को येल स्कूल के दरवाज़े पर ही लिख दिया गया है।

क्रिस्टीन ने ही सुप्रीम कोर्ट बनने जा रहे कावानॉव पर आरोप लगाया था। येल के कैंपस में नोटिस बोर्ड पर छात्रों ने लिख दिया कि येल भी इस अपराध में शामिल है। किसी ने इन पोस्टरों को नहीं फाड़ा है।

जो यूनिवर्सिटी के ख़िलाफ़ हैं। ख़िलाफ़ हो जाना यहाँ सामान्य बात है तब भी जब यूनिवर्सिटी कई मामलों में बड़े प्रोफ़ेसरों को बचाता है। येल के ख़िलाफ़ होने वाली रैलियों को पहले पन्ने पर जगह दी जाती है।

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1878 में येल न्यूज़ क़ायम हुआ था, अमरीका का सबसे पुराना कैंपस अख़बार है। वेबसाइट भी है और हार्डकापी भी है। जिस इमारत में यह अख़बार रोज़ बनता है वहाँ जाना ही शानदार अनुभव रहा।

इसी अख़बार के लिए काम कर चुकीं पूर्व फ़ोटोग्राफ़र और भारतीय छात्र सुरभि ने जो बताया और दिखाया आपके लिए पेश कर रहा हूँ ताकि भारत के कई यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता की पढ़ाई के नाम पर बर्बाद किए जा रहे छात्रों को यह शिकायत न रहे कि किसी ने बताया नहीं।

गोशाला चलाने और हनुमान और आध्यात्मिक संचार पर सेमिनार से सीख कर जब महान हो जाएँ तो इन बातों पर हंस सकें कि कोई इन सब जाने बग़ैर कैसे पत्रकार बन जाता है। वो भी 1878 से चले आ रहे अख़बार में।

अख़बार की तस्वीर के बाद की तस्वीर में आप इस कमरे को देखिए। यहाँ रिपोर्टर बैठकर अपनी स्टोरी लिखते हैं। दीवारों पर येल न्यूज़ के बोर्ड की तस्वीर है। सुरभि ने बताया कि साठ के दशक तक केवल मर्द होते थे और वो भी गोरे।

उसके बाद इसमें बदलाव आना शुरू होता है। महिलाएँ भी सत्तर के दशक से इस अख़बार के बोर्ड से जुड़ती हैं। बोर्ड येल न्यूज़ का संचालक मंडल है। हमने कुछ तस्वीरों का क्लोज़ भी आपके लिए लिया है।

तीसरी तस्वीर ऋंखला में आप देख रहे हैं कि इमारती लकड़ी का कमरा बना है। दीवारों पर किताबें हैं। येल न्यूज़ के पहले चेयरमैन का पोर्ट्रेट है। इस अख़बार में काम करने के बाद जब ब्रिटन हेडन यूनिवर्सिटी से निकले तो टाइम मैगज़ीन की स्थापना की।

इसी कमरे में संपादक मंडल की बैठक होती है। इस अख़बार में चालीस छात्रों की टीम काम करती है, छात्रों से ही कई रिपोर्टर हैं। संपादक है। एंकर हैं। फ़ोटोग्राफ़र हैं। अलग-अलग देशों और अलग-अलग विषयों के छात्रों से यह टीम बनी है।

सुरभि ने बताया कि येल न्यूज़ में काम कर चुके पत्रकार अमरीका के कई अख़बारों के संपादक बने। आज भी हैं। पुराने छात्रों के चंदे से इस अख़बार का काम चलता है।

पैसे की कोई कमी नहीं है। सुरभि मुझे इस आख़िरी कमरे में ले आई। जब बोर्ड का कार्यकाल पूरा होता है तो इस कमरे की दीवारों पर अपने कार्यकाल के दौरान के सबसे उम्दा संस्करण की कापी यहाँ चिपका दी जाती है।

येल यूनिवर्सिटी photo के लिए इमेज परिणाम

एक तस्वीर में देखेंगे कि एक लड़ती कुर्सी पर खड़ी होकर एक चेहरे पर बर्फ़ पोत रही है। जिसका चेहरा ढँका जा रहा है वो नस्लभेदी था। इसके नाम पर कालेज बना था। हाल में काफ़ी विवाद चला कि नफ़रत की बात करने वाले के नाम पर कॉलेज कैसे है। लंबे समय तक येल ये नाम बदलने से मना करता रहा लेकिन बाद में बदल दिया।

येल न्यूज़ की तरह अपने संस्थान में अख़बार बनाएँ। येल डेली न्यूज़ की वेबसाइट पर जाकर इस पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करें। मास्टर की औक़ात नहीं है तो ख़ुद के लिए बनाएँ।

पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान ही अपना विस्तार करें। कुछ नया और बड़ा कीजिए। यह काम IIMC से शुरू हो जाए। पहली ख़बर अख़बार में  प्रधानमंत्री की किसी नीति की आलोचना की है और दूसरी ख़बर संस्थान की नीति की आलोचना की।

छाप कर देखिए, दाँत चियार देंगे संचालक। कुछ नहीं तो उन्हें येल न्यूज़ के दस बारह अंक ही भेज दें और पूँछे कि विश्व गुरु भारत में विचारों और लिखने के साहस की लघुता क्यों है? डिजिटल इंडिया बुज़दिल इंडिया क्यों है? इस इंडिया की जवानी मुर्दा क्यों हैं? बेचैन होने की उम्र में बेचैन क्यों नहीं है?

यह लेख मूल रूप से रवीश कुमार के फेसबुक पेज पर प्रकाशित हुआ है.

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