नरेन्द्र चौहान

BYनरेन्द्र चौहान


आपकाे चवन्नी याद है? अठन्नी ताे याद हाेगी न ! आर्थिक जगत में ये अब इतिहास हाे गई हैं जैसे 1 पैसा 5 पैसा 10 पैसा व 20 पैसे के साथ हुआ। अब अगला नंबर 1 रूपए का है। कभी लेन देन जमा घटाव के सारे हिसाब काे अपने इर्द गिर्द घुमाने वाले ये सिक्के अब संग्रालय में जगह पाने के लिए भी जूझ रहे हैं।

ठीक इसी तरह सामाजिक मानकाे की बुनियाद से विश्वास , अपनत्व, संवेदना, निस्वार्थ सेवा जैसे शब्द इतिहास बनने की कगार पर हैं। यह बदलाव की वह बयार है जाे भाैतिकतावाद के नए मानकाें काे स्थापित कर रही है। जिसमें विशवास, सवेंदना जैसे शब्दाें के लिए काेई जगह नही है।

आप किसी पर भी विशवास नहीं कर सकते। हर किसी पर अपने निजी हित पूरा करने की कुंठा प्रभावी है। जिसे देखिए अपना उल्लू सीधा करने के लिए एक दूसरे को भरमाने कि फिराक में है। आलम यह है कि माँ बेटी का क़त्ल कर रही है, बेटी पिता के पास सुरक्षित नहीं है।

बूढ़े माँ बाप आैलाद के ज़ुल्माें का शिकार हाे रहे हैं। समाज सेवा दिखावा हो गया है। कुछ विरले ही हैं जो निस्वार्थ भाव से परोपकार की सुखती बेल को ईमानदारी के पसीने से सींच रहे हैं। अन्यथा इंसानियत व सामाजिक ताने बाने, रिश्ते-नातों की नींव के मजबूत आधार रहे विश्वास, संवेदना, परोपकार जैसे शब्द कमजोर पड़ने लगे हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि वह दिन दूर नहीं जब मानवीय जीवन की दिशा व दशा तय करने वाले ये शब्द शब्दकोश में दफन होकर रह जाऐंगे। शायद हमारी आने वाली नस्लें इन शब्दों पर शाेध करेंगी कि क्या सच में कभी विशवास जैसे इन शब्दों ने इंसानियत को जिंदा रखने में अहम भूमिका निभाई थी?

(लेखक स्वतंत्र विचारक हैं तथा हिमाचल प्रदेश में रहते हैं।)

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