सुशील भीमटा

BYसुशील भीमटा


आज कुदरत के छेड़छाड़ से मौसम में होते अकस्मात बदलाव से होती भारी बारिश और बादल फटने से धरती पर आए दिन खौफनाक मंजर देखनें पड़ते हैं।जिसकी सबसे ज्यादा गाज कच्ची बस्तियों, झोपडियों और फुटपातों पर रहने वाले बेबस गरीबों पर पड़ती है।

ऐसे खौफनाक मंजर सामने आते हैं कि दिल दहल जाता है। लगातार होती बारिश से देश के कोने-कोने से चीख पुकार और लाचारी बेबसी सुनाई देती है। आज आजादी के 70 साल बाद भी हिन्दोस्तान के 25 से 30% लोग झोपड़ियों और फुटपातों पर जी रहे हैं क्यों?

express photo javed raja

दोस्तों आये दिन लगाये जाने वाले टैक्सों से बुलेट ट्रेन तक के सपनें तो देखे जा रहे हैं और हम चांद तक भी पहुंच गए हैं मगर अपने गरीब भारतीय नागरिकों के लिए एक पक्की छत का प्रबंध करने की सोच तक नहीं रखते।

क्यों हमारे कानून या संविधान में कोई ऐसी व्यवस्था या संधोधन नहीं किया जा सकता कि सर्वप्रथम फुटपातों और झोपड़ियों में नरक से बदतर जिंदगी गुजारते उन मासूम नागरिकों को प्राथमिक तौर पर सरकार को मकान बनवाने के लिए बाध्य किया जाये?

वो गरीब वर्ग ही तो है जो मजदूर, कारीगर, शिल्पकार की भूमिका निभाकर बड़े-बड़े आलिशान बंगलो से लेकर मेट्रो ट्रेन की लाइनें बिछानें तक अहम भूमिका निभाकर देश के विकास में चार चांद लगाकर देश का विदेशों में भी नाम रोशन करते हैं और एक विकासशील देश को विकसित बनानें में अपना खून पसीना बहाकर एक मांझी का काम करते हैं।

आप ही बतायें इनके बगैर दुनियां में कुछ भी संभव है?
जी हां घर से देश तक इनके बगैर कुछ भी संभव नहीं!
क्या कोई उच्च वर्ग का आदमी 40 ,42 के तापमान में काम करके खेत में फसल उगा सकता है?

क्या कोई लखपति मकान के लिए पत्थर, ईंट, सीमेंट आदि समान अपनी पीठ पर ढोता नजर आता है? क्या कभी कोई करोड़पति अपने बंगले, गाडी की सफाई खुद करता नजर आता है?

क्या कभी कोई उच्चवर्ग या मध्यम वर्ग का आदमी फल, सब्जी, आनाज अपने  कंधों पर ढोता नजर आता है?

क्या कभी उच्च वर्ग या मध्यम वर्ग का आदमी रेललाइन बिछाता, कचरा साफ करता, गटर साफ करता, मल उठता, बड़े-बड़े भवनों को अपने हाथों से बनाता, गाडी के नीचे लेटकर गाड़ी ठीक करता, शादी विवाह और अन्य ख़ुशी के समारोहों पर खुद लोगों की सेेवा करता नजर आता है?

क्या कोई उच्च या मध्यम वर्ग के परिवार का आदमी शमशान घाट पर मुर्दे जलाता नजर आता है?
दोस्तों लिखने के लिए इतना कुछ है कि एक पूरी किताब बन जाये। संक्षेप में बस यही कहूंगा कि जन्म से मरण तक, घर से वतन तक, मकान से शमशान तक, रेल लाईन तक यही फुटपातों और झोपड़ियों में रहता खून पसीना बहाता गरीब हिंदुस्तानी ही नजर आता है। कहने का मतलब है कि ये वो मांझी हैं जिनके बिना हमारी जीवन नैया कभी भी नहीं चल सकती।

आज आजादी के 70 सालों बाद भी इस माझी की ज़िदगी रोती बिलखती, दम तोड़ती फुटपातों और झोपड़ियों में ही नजर आती है, क्यों ?

दोस्तों अपनी निगाह अपने चारों तरफ डालो इनके बगैर हम शून्य हैं। मैं आप सब उच्च और मध्यम वर्ग के परिवारों से एक सहमति चाहूँगा कि हमपर एक ऐसा टेक्स भले ही और लगा दिया जाए और संविधान में संशोधन करके एक ऐसा कानून बनाया जाये जिससे इकट्ठे हुए धन से फुटपातों और झोपड़ियों में रह रहे इस मॉझी या मसीहा को कम से कम एक पक्की छत दी जा सके।

साथ ही एक निवेदन सर्वोच्च न्यायलय से भी करना चाहूंगा कि जीनें के अधिकार में एक संशोधन ये किया जाए कि हर भारतीय नागरिक को एक मकान देना भारत सरकार का प्रथम उत्तरदायित्व ठहराया जाये और इसके निर्माण कार्य की देख रेख न्यायलयों की अधीन की जाए और टैक्स से जमा पूंजी को सिर्फ पक्की बस्तियों के निर्माण में ही खर्च किया जाये।

अगर भारतीय नागरिक के परिवार के लिए हम आजादी के 70 साल बाद भी एक कमरा तक नहीं बना सकते वो भी उस नागरिक के लिए जिसके बिना जीना नामुमकिन है तो हमारे विकास और आजादी के कोई माइने नहीं रह जाते। पोस्ट अच्छी लगे तो शेयर व कमेंट अवश्य करें।

“मेरी कलम को आवाज दो, हर भारतीय को एक मकान दो। करो संशोधन संविधान में, कानून को नई जान दो।।”

लेखक स्वतंत्र विचारक हैं और हिमाचल प्रदेश के देवभूमि में रहते हैं।

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