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बेचारी नरेंद्र मोदी सरकार जब से आई है, देश पर तो देश पर, उस पर भी खतरा मंडराता रहता है। प्रधानमंत्री जी तो खैर सतत खतरे में रहते ही हैं। हर महीने-पंद्रह दिन के बाद इस खतरे के और बढ़ जाने की खबर आती है।

फिर पाकिस्तान और चीन से खतरा तो परमानेंट है और लगता है,परमानेंट ही रहेगा। अभी हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल जी ने फरमाया है कि देश के बाहरी दुश्मनों से तो कम यानी चीन-पाकिस्तान से तो कम, देश के ‘अंदरूनी दुश्मनों’ से ज्यादा खतरा है।

इतना भारी खतरा है कि देश मेंं अगले दस साल तक एक मजबूत सरकार चाहिए यानी मोदी सरकार चाहिए यानी अगले दस साल और डोभाल जी को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पद चाहिए। इसके बाद तो यानी ही यानी हैंं। अनेक में से एक यानी यह है कि लोकतंत्र हमेशा मजबूत सरकार नहीं देता, बार- बार मोदी जी को भारी बहुमत नहींं देता, उनकी सरकार को हराने की संभावना भी पैदा करता है यानी मजबूत सरकार की गारंटी नहीं देता यानी हमें लोकतंत्र नहीं चाहिए यानी फिर क्या चाहिए, यह आपको अच्छी तरह से मालूम है।

और जरूरी तो नहीं कि मोदी सरकार के रहते अगले दस साल में ही यह खतरा टल जाए, पिछले साढ़े चार साल का इतिहास तो इसका आश्वासन तक नहीं देता! वैसे भी मजबूत हो या कमजोर सरकार, वह जो भी लक्ष्य निर्धारित करती है, वे समय पर तो क्या असमय भी पूरे कहाँ होते हैं? साक्षरता का लक्ष्य आज तक पूरा नहीं हुआ और दस साल मजबूत सरकार रही तो पूरा होगा भी नहीं क्योंकि लक्ष्य तो ‘मजबूत सरकार’ है न, साक्षरता, स्वास्थ्य आदि तो नहीं!

और ‘मजबूत सरकार’ का वास्तविक अर्थ भी आप समझते ही होंगे, जो जितने डंडे-गोली चलाए, फर्जी मुठभेड़ में फटाफट लोगों को मारे, भीड़ को जिसको चाहे, पीठने-मार डालने की आजादी दे, किसी की न सुने, जो खुद बोलते- बोलते अपना विज्ञापन करते-करते कभी न थके, जो हमेशा देश खतरे में है, हिंदू खतरे में है, गाय खतरे में है , सेल्फी खतरे में है, वह खुद खतरे में है, यह ज्ञान दे ,वह मजबूत सरकार! जिसका मुखिया बके तो आलतू- फालतू बातें बकता ही चला जाए और जहाँ बोलना चाहिए, वहाँ न बोले और बोले तो उसका कोई मतलब न हो, वह सरकार, ‘मजबूत सरकार’ है!

‘मजबूत सरकार’ के मतलब वैसे कई हैं, किसी बड़े से बड़े कवि की बड़ी से बड़ी कविता के जितने मतलब हो सकते हैं, उससे भी हजार गुना अधिक गहरे हैं। इसी एक शब्द पर शब्दकोश क्या, विश्वकोश बन सकता है, बशर्ते कि यूजीसी इसके लिए ग्रांट न दे!

आगे बढ़ते हैं।डोभाल जी तो पहाड़ी आदमी हैं, सुरक्षा सलाहकार हैं मगर सीधेसादे इनसान हैं।उन्हें तो दस साल ही और चाहिए, बशर्ते कि मोदी जी प्रधानमंत्री रहें और वह सुरक्षा सलाहकार!

अमित शाह जी को तो पचास साल और चाहिए। और शाह साहब बिल्कुल सही हैं। अब देखिए न,पिछले शुक्रवार की ही बात लीजिए।मजबूत सरकार के रास्ते में एक और मजबूत खतरा पैदा हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक पद से रातोंरात हटाए गए आलोक वर्मा पर लगे आरोपों की जाँच दो सप्ताह में पूरी करने और वह भी सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व जज साहब की निगरानी में पूरी करने और कार्यकारी निदेशक कोई नीतिगत निर्णय नहीं लेने और जो फैसले अभी तक उन्होंने किए हैं, सबकी जानकारी सुप्रीम कोर्ट ने माँग ली है!इसका मतलब यह हुआ कि ‘मजबूत सरकार’ ने सीबीआई को ‘मजबूत’ करने के लिए आधी रात को ‘मजबूती’ से जो कदम उठाए थे,वे सब कमजोर कर दिए गए! हालात ऐसे रहे तो दस साल से ही काम नहीं चलनेवाला!ज्यादा साल चाहिए। बीस नहीं तो पंद्रह तो चय्ये ही चय्ये।

फिर शहरी नक्सलियों से भी खतरा है। किसानों से भी खतरा है, कांग्रेस से भी खतरा है, जेएनयू से भी खतरा है, वामियों से भी खतरा है। जवाहरलाल नेहरू से खतरा तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा!

अभी बता नहीं रहे हैं मगर सच पूछो तो संविधान से भी सरकार को खतरा है यानी बाबासाहेब अंबेडकर से भी खतरा है। काले झंडे से खतरा है, विरोध प्रदर्शन से खतरा है, मुसलमानों से खतरा है।

जिधर देखो, उधर अंदर के ‘दुश्मनों’ से खतरा है। इसलिए डोभाल साहब, अमित शाह सही कहते हैं इन खतरों से निबटने की सरकारी समय सीमा आसानी से पचास साल अभी बताई जा सकती है। फिर का फिर देखा जाएगा। तब तक मोदी जी, शाह जी का राज तो चलता ही रहेगा और डोभाल साहब इनकी वजह से आपका राज भी चलता रहेगा। आप भी दस नहीं, पचास साल का समय माँगो। और उम्र का क्या है, जिसने सरदार पटेल की विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा बनाने तक के लिए मोदी जी जैसे देवदूत को धरती पर भेजकर प्रधानमंत्री बनने का अवसर दिया, क्या वह इतना कृपण है कि ‘मजबूत सरकार’ चलाने के लिए आप सबको मिनिमम सवा सौ साल की उम्र नहीं देगा!

तब तक विकास, जो कि अभी तेल लेने गया है, शायद लौट आए और पूछे-‘ मे आई कम इन सर’? और क्या पता साहेब कहें- ‘हूँ। हाँ बता भैया अब भी तेरा कुछ काम बचा है क्या, मजबूत सरकार ही मजबूत विकास है और वह काम डोभाल जी और मैंने कर लिया। जा, अब तू आराम कर’!

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