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BY-THE FIRE TEAM


वर्तमान समय में संसद में दो क़ानून लंबित है. ये प्राइवेट मेंबर बिल हैं, जिन्हें लोकसभा के चुनाव से पहले पारित कराने पर जोर है.

पहला बिल कहता है कि किसान को अपनी फसल की न्यूनतम क़ीमत क़ानूनी गारंटी के रूप में मिले. आज की व्यवस्था में यह सरकार की दया पर निर्भर करता है कि उन्हें क्या मिले.? चुनावों से पहले घोषणा कर दी जाती है, उन्हें मिले न मिले, यह सुनिश्चित नहीं हो पाता है.

दूसरा बिल कहता है कि किसान जिस कर्ज में डूबा हुआ है, उस कर्ज से एक बार किसान को मुक्त कर दिया जाए, ताकि वो एक नई शुरुआत कर सके.

हम चाहते हैं कि सरकार ये दोनों क़ानून संसद में पास करवाए. इस देश में सभी तरह की सरकारें आई हैं. अच्छी, बुरी. लेकिन वर्तमान सरकार जैसी झूठी सरकार नहीं आई.

नरेंद्र मोदी सरकार साफ़ झूठ बोलती है. ये जुमला चलाते हैं किसानों की आय दोगुनी कर देंगे. सरकार का कार्यकाल ख़त्म होने को आया है,

और अब तक इनको यह पता तक नहीं है कि किसानों की आय बढ़ी या नहीं बढ़ी.

सरकार की एक उपलब्धि है कि फसल बीमा योजना में सरकार का ख़र्चा साढे चार गुणा बढ़ गया लेकिन उसके दायरे में आने वाले किसानों की संख्या नहीं बढ़ी.

फसल बीमा योजना के तहत किए गए किसानों के दावों की संख्या इस सरकार में घट गई है. सरकार कहती है कि एमएसपी उसने डेढ़ गुणा कर दिया है, ये पूरी तरह झूठ है.

बुरे हालात के लिए कौन ज़िम्मेदार ?

किसानों के आज हो हालात हैं उसके लिए किसी एक सरकार को ज़िम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा. पिछले 70 सालों में कांग्रेस ने सबसे ज़्यादा सत्ता का सुख भोगा है, लेकिन देश के भले-चंगे किसान को बीमार बना के अस्पताल में भर्ती करवा दिया.

और मोदी सरकार ने उन बीमार किसानों को अस्पताल के वार्ड से आईसीयू तक पहुंचा दिया है. किसानों को उस आईसीयू से कैसे निकाला जाए, यह बड़ी चुनौती है.

किसानों की बदहाली का स्थायी इलाज सिर्फ़ ऊपर में चर्चा किए गए दो कानून नहीं हैं, पर ये उन्हें राहत ज़रूर दे सकते हैं.

अगर ये दो बिल पास हो जाते हैं तो किसानों की नाक जो पानी में डूबी है, वो पानी से ऊपर आ जाएगा. ये भी सच है कि ये दोनों कानून बनते हैं तो भी वो पूरी तरह पानी से नहीं निकल पाएंगे.

स्थायी इलाज अर्थव्यवस्था को बदलने से होगा. देश में जो सिंचाई की व्यवस्था है, उसे बदलने की ज़रूरत है, खेती के तरीकों के बदलने की ज़रूरत है.

किसानी के सामने कैसे-कैसे संकट ?

भारतीय किसानी आज तीन तरह के संकट का सामना कर रही है.

पहला- खेती घाटे का धंधा बन गई है. दुनिया का और कोई धंधा घाटे में नहीं चलता, पर खेती हर साल घाटे में चलती है.

दूसरा- इकोलॉजिकल संकट है . पानी ज़मीन के काफ़ी नीचे पहुंच गया है, मिट्टी उपजाऊ नहीं रही और जलवायु परिवर्तन किसानों पर सीधा दबाव डाल रहा है.

तीसरा- किसानी के अस्तित्व का है . किसान अब किसानी करना नहीं चाहता. मैं पूरे देश के गांव-गांव गया हूं और मुझे एक किसान भी ऐसा नहीं मिला कि वो कहे कि वो अपने बेटे को किसान बनाना चाहता है.

किसान पलायन कर रहे हैं, आत्महत्या कर रहे हैं. पिछले 20 सालों में तकरीबन तीन लाख किसानों ने आत्महत्या की है.

रोष में किसान क्यों ?

वो पहले से दुख में तो थे हीं, पर पिछले दो साल के सूखे ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया. इसके बाद जब अच्छी फसल हुई तो उसकी क़ीमत गिर गई.

उन्हें वाजिब दाम नहीं मिला. तब उन्हें गुस्सा आया कि ये हो क्या रहा है उनके साथ. इसी वजह से किसान आंदोलनरत हुआ है.

ये दो देशभर के किसान संगठन एक साथ आए हैं, तारीखी है, ऐतिहासिक है. आंदोलन में हर तरह के संगठन साथ हैं. लाल झंडा, पीला, हरा और हर तरह के झंडे साथ हैं.

पहली बार पूरे देश का किसान एक साथ आगे आ रहा है. पहली बार मध्यम वर्ग उनको अपना समर्थन दे रहा है. डॉक्टर, वकील, आम लोग उन्हें सहयोग कर रहे हैं.

किसानों की आवाज़ में आज जो खनक है, उससे यह उम्मीद की जा सकती है इससे कुछ नतीजा निकलेगा.

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