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BY-THE FIRE TEAM


48 साल के शिवराम पूरे यक़ीन के साथ कहते हैं कि डेबिट कार्ड की गांवों में कोई जगह नहीं है और ये शहरों में रहने वाले लोगों के लिए ही बना है.

शिवराम के पास तीन गायें हैं और वो स्थानीय मिल्क प्रोड्यूसर सोसायटी को दूध सप्लाई करते हैं. शिवराम के पास पिछले चार साल से एक डेबिट कार्ड है जो उनके गांव के एक राष्ट्रीयकृत बैंक से मिला है.

शिवराम का बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि वोंड्रागुप्पे गांव से ताल्लुक रखते हैं जो भारत में तकनीक की राजधानी कहे जाने वाले बैंगलुरु से 60 किलोमीटर दूर, रामनगरम ज़िले में बैंगलुरु-मैसूर हाइवे पर स्थित है.

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वोंड्रागुप्पे वो गांव है जो दो साल पहले नोटबंदी के बाद ‘कैशलेस गांव’ के नाम से सुर्खियों में आया था. नोटंबदी के बाद जब केंद्र सरकार कड़ी आलोचनाओं में घिर गई तब इसने ‘कैशलेस समाज’ को नोटबंदी का एक मक़सद बताकर इसका प्रचार किया.

नोटबंदी के बाद बैंगलुरु-मैसूर हाइवे पर गांव को कैशलेस बताते हुए एक बोर्ड लगा दिया गया और इसे एक उपलब्धि के तौर पर दिखाने की कोशिश की गई.

शिवराम जिस सोसायटी में दूध पहुंचाते हैं वहां से उन्हें हर 15 दिन पर पैसे मिलते हैं जो सीधे उनके बैंक खाते में ट्रांसफ़र कर दिए जाते हैं. यहां बैंकों में काम करने वाली दो महिलाएं ‘मैक्रो एटीएम’ के जरिए लोगों तक पैसे पहुंचाती हैं.

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शिवराम ने बीबीसी से बताया, “मैं उन्हें अपना आधार कार्ड दिखाता हूं और अंगूठे के निशान देता हूं. इससे मशीन मुझे पहचान जाती है और मुझे अपने पैसे मिल जाते हैं.

यानी शिवराम अपना डेबिट कार्ड इस्तेमाल नहीं करते बल्कि उसे सुरक्षित घर पर रखे रहते हैं. ऐसा करने वाले वो अकेले नहीं हैं बल्कि 83 साल के बसावरजैया भी ऐसा ही करते हैं.

बसावरजैया के पास चार एकड़ ज़मीन है. वो दो सहकारी संस्थाओं को दूध और रेशम के कीड़े बेचते हैं. इसके बदले में दोनों संस्थाएं उनके बैंक में पैसे जमा कर देती हैं.

बसावरजैया कहते हैं, “मेरे पास भी डेबिट कार्ड है और मेरे बेटों के पास भी लेकिन हम इन्हें इस्तेमाल नहीं करते. हम बैंक जाकर चेक से पैसे निकालते हैं.”

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तो फिर ‘कैशलेस’ क्या है?

उदय कुमार कहते हैं, “हमारी सेवाओं के बदले मिलने वाले पैसे सीधे हमारे बैंक खातों में जमा हो जाते हैं. इसके बाद बैंक में काम करने वाली महिलाएं एटीएम लेकर हमारे घर आती हैं और हमें कैश मिल जाता है. इसी को यहां कैशलेस सिस्टम कहा जाता है.”

क्या वो दुकानों से सामान खरीदने के लिए कार्ड इस्तेमाल नहीं करते? इस सवाल के जवाब में शालिनी कहती हैं, “गांव में कुछ पढ़े-लिखे लोग हैं. बाकियों को डेबिट कार्ड इस्तेमाल करने ही नहीं आता. यहां दुकानों पर स्वाइप मशीनें भी नहीं हैं.”

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शालिनी के शब्द हाइवे पर लगे ‘कैशलेस गांव’ के दावों पर सवाल उठाते हैं. यहां बैंक के ‘माइक्रो एटीएम’ से पैसे निकालने के लिए लोगों की लंबी लाइन लगती है.

माइक्रो एटीएम के अलावा यहां एक सामान्य एटीएम है और वहां भी लोगों की लंबी लाइन लगी है. बैंक का सिक्योरिटी गार्ड लोगों के डेबिट कार्ड में झांककर उनका पिन नंबर देखता है और फिर सही बटन दबाकर पैसे निकालता है. इसके बाद ही पैसे लोगों के हाथ तक पहुंचते हैं.

एक बैंक अधिकारी ने पहचान उजागर न करने की शर्त पर बताया, “क़रीब 99 प्रतिशत गांव वाले तो पैसे लेने के लिए घर का दरवाज़ा भी पार नहीं करते हैं, वे बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट से पैसे ले लेते हैं. अगर रकम 10 हज़ार रुपये से अधिक है तभी वे एटीएम या चेक से पैसे निकालते हैं.”

यहां हाईवे पर एक दुकान है. यह दुकान उस सरकारी बोर्ड से महज़ 50 मीटर की दूरी पर है जिस पर ये लिखा हुआ है कि यह गांव कैशलेस है.

इस दुकान के मालिक नाम तो नहीं बताते लेकिन इतना ज़रूर कहते हैं “बिस्किट के एक पैकेट के लिए या कुरकुरे के लिए चाहे एक कप चाय के लिए, क्या कोई कार्ड स्वाइप करेगा? मेरे पास तो कार्ड स्वाइप करने वाली मशीन (PoS) नहीं है.”

एक बैंक कर्मचारी ने बताया कि यह कार्ड स्वाइप मशीन 500 रुपये के मासिक किराए पर उपलब्ध है, इसके अलावा 90 रुपये जीसटी देना होता है.

“लेकिन गांवों में लोग अपना डेबिट कार्ड उस तरह से लेकर नहीं बाहर घूमते हैं या निकलते हैं जिस तरह से शहरी लोग. कई बार उनके लिए पिन याद रखना भी मुसीबत बन जाता है.”

वोंड्रागुप्पे गांव के लोगों और यहां से महज़ 58 किलोमीटर मांड्या ज़िले के चंदागालू गांव के लोगों के लोकेश के बीच जो एक अंतर है वो ये कि वो जब भी ज़िला मुख्यालय जाते हैं तो पेट्रोल के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं.

कर्नाटक
लोकेश

लेकिन उनकी ये कहानी प्रोफ़ेसर एम एस श्रीराम को बिल्कुल भी आश्चर्यचकित नहीं करती है. आईआईएम बेंगलुरू के सेंटर फ़ॉर पब्लिक पॉलिसी में बतौर विज़िटिंग फैकल्टी काम करने वाले श्रीराम को समावेशी अर्थव्यवस्था और बैंकिग में विशेषज्ञता हासिल है.

प्रोफ़ेसर श्रीराम कहते हैं कि शहर और गांवों के बुनियादी ढांचे में ही काफी अंतर है. वो चाहे दूरसंचार की बात हो या फिर एटीएम के सही तरीक़े से काम करने के लिए आवश्यक बिजली की सप्लाई जैसे बुनियादी ढांचे की.

दोनों जगहों में काफी अंतर है. साथ ही डिजिटल अर्थव्यवस्था की आधार संरचना तो ज़्यादातर प्राइवेट सेक्टर द्वारा ही संचालित की जाती है.

प्रोफ़ेसर श्रीराम ने बीबीसी को बताया “चूंकि ये सारा कुछ प्राइवेट सेक्टर द्वारा संचालित होता है, ऐसे में जब भी कोई ट्रांज़ेक्शन होता है तो इन कंपनियों का भी कुछ रेवेन्यू शेयर होता है जोकि पैसा भेजने वाले और पाने वाले के बीच होता है.

अगर निकाली जाने वाली रकम कम होती है तो रेवेन्यू अधिक होता है. और शायद यही वजह है कि लोग छोटी राशि के लिए अब भी डिजिटल मनी को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाये हैं.”

एटीएमREUTERS

हालांकि वो ये मानते हैं कि धीरे-धीरे ही सही लेकिन कार्ड स्वाइप मशीनों की संख्या पहले की तुलना में बढ़ी है. इसका एक मतलब ये भी हुआ कि गांवों में भी लोग अब डिजिटल मनी कार्ड का इस्तेमाल कर रहे हैं.

बावजूद इसके प्रोफ़ेसर श्रीराम मानते हैं कि लोग आगे भी कैश का इस्तेमाल करते रहेंगे. ठीक उसी तरह जिस तरह शिवराम बताते हैं कि वो मैक्रो एटीएम से पैसे निकालते हैं.

(साभार-बीबीसी हिन्दी)

 

 

 

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