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BY-THE FIRE TEAM

दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले दिनों हुए चुनाव में जहां एबीवीपी ने अपना परचम लहराया वहीं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में लेफ्ट ने एबीवीपी के साथ ही अन्य स्टूडेंट यूनियन को भी चित कर दिया।

वामपंथी छात्र संगठन आइसा, एसएफआई, एआईएसएफ और डीएसएफ के संयुक्त मोर्चा ने जेएनयू छात्र संघ चुनाव (2018) में केंद्रीय पैनल के सभी चार पदों पर जीत दर्ज की।
वामपंथियों के विपरीत विचारधारा रखने वाली एबीवीपी सभी पदों पर दूसरे नंबर पर रही। भले ही एबीवीपी दूसरे स्थान पर रही परंतु संयुक्त वाम के जीत का अंतर काफी ज्यादा रहा।

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अध्यक्ष पद पर लेफ्ट यूनिटी के एन साई बालाजी की जीत हुई है। इनको कुल 2161 वोट मिले जबकि दूसरे स्थान पर रहे एबीवीपी के ललित पांडे को 972 वोटों से ही संतोष करना पड़ा।
इसके साथ ही उपाध्यक्ष पद पर लेफ्ट के सारिका चौधरी की जीत हुई उन्हें 2592 वोट मिले जबकि एबीवीपी की गीताश्री 1013 वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहीं।

जनरल सेक्रेटरी पद की बात की जाए तो इसमें लेफ्ट युनिटी के एजाज की जीत हुई। इनको कुल मिलाकर 2423 वोट मिले वहीं एबीवीपी के गणेश को 1235 को वोट मिले हैं।

ज्वाइंट सेक्रेटरी के पद पर लेफ्ट युनिटी की अमुथा 2047 वोट पाकर जीत हासिल की तो वहीं एबीवीपी के वेंकट चौबे 1290 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे।

बता दें कि वाम समर्थित ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन(AISA), स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया(SFI),डेमोक्रेटिक स्टूडेंट फेडरेशन (DSF) और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन(AISF) ने वाम एकता नाम का गठबंधन बनाकर जेएनयू छात्रसंघ चुनाव लड़ा था।

इस बार के चुनाव में वाम एकता के अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP), कांग्रेस की छात्र इकाई नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) और बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन(बापसा) के उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे।

बीते 6 सालों में इस बार जेएनयू छात्र संघ चुनाव में सबसे ज्यादा(67.8) मतदान हुआ । करीब 5000 से ज्यादा छात्रों ने चुनाव में अपने मत का प्रयोग किया।

इस चुनाव की खास बात यह रही कि वाम गठबंधन ने दूसरे नंबर पर रही एबीवीपी को सभी सीटों पर करीब 50 प्रतिशत के अंतर से मात दी है। आप देखेंगे कि सभी चारों पद पर वाम गठबंधन लगबग 2000 से 2500 मत के पास पहुंचा जबकि एबीवीपी 1000 से 1200 मत के पास।

2018 के जेएनयू छात्रसंघ चुनाव कहीं ना कहीं वाम दलों को यह संकेत भी दे रहे हैं कि यदि भारत में अपना भविष्य बनाए रखना है तो सबको एक साथ आना पड़ेगा। दरसल केरल राज्य को छोड़कर भारत का ऐसा कोई भी राज्य अब नहीं बचा है जहां पर किसी भी प्रकार की वाम सरकार हो।

पहले वाम दल केरल के साथ-साथ पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्वी राज्यों में फैला हुआ था।

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