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BYTHE FIRE TEAM

कल दिनांक 6 सितंबर 2018 को पूरे पुलिस प्रशासन के साथ लखनऊ विकास प्राधिकरण के अधिकारी लखनऊ के अंबेडकर नगर गांव में पहुंचे। यह गांव शारदा नगर वार्ड में आशियाना इलाके में पावर हाउस चौराहे से थोड़ी दूर पर स्थित बिजली पासी किला के पास पड़ता है।

बस्ती वालों का कहना है कि अंबेडकर नगर एक गांव के अंतर्गत आता है परंतु लखनऊ विकास प्राधिकरण का मानना है कि यह अवैध बस्ती है।

दरअसल इस बरसात के मौसम में लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा इस बस्ती को खाली कराए जाने का क्या औचित्य है?

जब द फ़ायर की टीम इस सिलसिले में इन बस्ती वालों से उनकी परेशानियों को जानने यहाँ पहुंची तो इन बस्ती वालों ने पुलिस प्रशासन से लेकर एलडीए अधिकारियों पर कई गंभीर आरोप लगाए।

जैसे ही हम इस बस्ती के निकट पहुंचे तो देखा कि कुछ लोग एक समूह में बैठे हुए थे।

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यह लोग आज भी इस डर के कारण यहां बैठे हुए थे कि कहीं एलडीए के अधिकारी और ज्यादा पुलिस प्रशासन के साथ आ कर उनके घरों को ना गिरा दें।

आपको बताते चलें कि इस बस्ती के लोग जहां पर रहते हैं उनको यह अपना घर मानते हैं परंतु एलडीए का मानना है कि ये झुग्गी झोपड़ियां हैं।

द फायर की टीम ने भी जाकर देखा तो पता चला कि यहां के लोग छोटे-छोटे मकान बनाकर रह रहे हैं। जिनमें एक या दो कमरे आपको देखने को मिल जाएंगे।

जब हमने इस सिलसिले में गांव वासियों से बात करना शुरू किया तो इनके घरों को गिराने से संबंधित कई प्रश्न उभर कर हमारे सामने आए।

ग्रामीण राजनारायण राव और रामबरन गौतम ने बताया कि जब एलडीए के अधिकारी बस्ती में उनके घरों  को गिराने आए थे तब इन अधिकारियों ने ग्राम वासियों के साथ बड़ा ही दुर्व्यवहार किया।

उन्होंने बताया की अधिकारियों के साथ आई पुलिस उनके सामान को भी बहुत ही बुरी तरीके से इधर-उधर फेंकने लगी।

इसी सिलसिले में इस ग्राम की पार्वती नाम की एक विधवा महिला ने पुलिस पर यह आरोप भी लगाया कि उन्होंने उनके 8000 रुपये भी चुरा लिए।

पार्वती जी वही रुमाल दिखाती हुई जिसमें उन्होंने रुपए लपेट के रखे थे। PHOTO: THE FIRE

आपको बताते चलें कि अंबेडकर नगर गांव की पार्वती जी दिहाड़ी मजदूरी करके अपने परिवार को चलाती हैं। इनके परिवार में इनके 5 बच्चे हैं जिनमें से दो विकलांग हैं।

पार्वती जी अपने परिवार के साथ: PHOTO: THE FIRE

जब द फायर की टीम ने रामबरन गौतम से आगे बातचीत की तो उन्होंने बताया कि एलडीए के द्वारा प्रशासन को भी यह नहीं बताया गया कि यह मामला अभी कोर्ट में लंबित है।

उन्होंने बताया की 31 मई 2018 को कोर्ट से बस्ती को खाली कराने का आदेश आया था परंतु उन्होंने पुनः याचिका कोर्ट में डाल दी जो कि अभी लंबित है।

रामबरन जी आगे बताते हुए कहते हैं कि अब यदि यह मामला कोर्ट में लंबित है तो फिर एलडीए किस नियम के तहत बस्ती खाली कराने आई थी। उन्होंने द फायर की टीम को इस सिलसिले में एक दस्तावेज भी दिखाया।

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जब हमने एक अन्य ग्रामीण मिश्री लाल जी से  इस गांव के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि यह गांव आज नहीं बल्कि 70 साल पहले से बसा हुआ है।

यानी कि यह गांव उस समय से है जब एलडीए( लखनऊ विकास प्राधिकरण) भी नहीं हुआ करता था।

मिश्रीलाल जी आगे बताते हुए कहते हैं कि आज इस गांव में करीब 100 परिवार रहते हैं जिनमें लगभग 500 सदस्य हैं।

उन्होंने बताया कि यह गांव शारदा नगर वार्ड में आता है और इसका 1994 में तत्कालीन सरकार में समाज कल्याण मंत्री राजबहादुर जी के द्वारा नामकरण भी किया गया था।

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उन्होंने आगे बताया कि बसपा सरकार में परिवहन मंत्री रहे रामअचल राजभर के द्वारा इसी गांव में बाबा साहब की प्रतिमा का अनावरण भी किया गया था परंतु फिर भी आज की सरकार हमें यहां रहने नहीं दे रही है।

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जब हमने गांव के कुछ और लोगों से इस सिलसिले में पूछताछ की तो रेखा शर्मा ने बताया कि वह एक बुटीक की दुकान चलाती हैं और जब पुलिस प्रशासन यहां पर बस्ती खाली कराने के लिए आई तो उनकी दुकान में रखे सामान को भी इधर-उधर फेंकने लगी।

रेखा जी ने बताया कि वह विकलांग हैं और इस दुकान से ही अपनी रोजी रोटी का गुजारा करती हैं।

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ग्रामीणों ने पुलिस पर यह भी आरोप लगाया कि वह राजनारायण राव और रामबरन गौतम को जबरदस्ती उठाकर पुलिस चौकी ले गई।

ग्रामीणों के इकट्ठा होने के पश्चात इन दोनों लोगों को पुलिस ने छोड़ा।

नरेश कुमार, रामस्वरूप द फायर की टीम को बताते हैं कि हम लोग पहले यहीं पर स्थित भट्ठे पर काम करते थे और जब यह भट्ठा यहां से समाप्त कर दिया गया तो हम लोग दिहाड़ी मजदूरी अन्य जगहों पर करने लगे।

जब हमने इन ग्राम वासियों से एलडीए द्वारा लिखित सूचना की जानकारी लेनी चाही तो उन्होंने बताया कि प्रशासन के द्वारा उनको किसी भी प्रकार से लिखित सूचना नहीं दी गई थी। जिस दिन बस्ती खाली कराने आए उस दिन भी उनके पास कोई लिखित सूचना नहीं थी।

ग्राम वासियों ने बताया कि पुलिस जबरदस्ती उनके ऊपर मुकदमा करने की बात भी कह रही है।

ग्राम वासियों ने आगे बताया कि लखनऊ विकास प्राधिकरण उनको डूडा कॉलोनी के अंतर्गत आवास देना चाहती है, लेकिन हम लोग यहां 70 साल से रह रहे हैं तो क्यों नहीं वह हमको यहीं पर आवास मुहैया करा देती है।

गयहां के लोगों का मानना है कि यह उनका पैतृक गांव है और यहां से उनके पूर्वजों की यादें जुड़ी हुई हैं।

दूसरी तरफ लखनऊ विकास प्राधिकरण का मानना है कि यह बस्ती 70 साल नहीं बल्कि 10 साल पूर्व की है और जो अवैध है।

डिस्क्लेमर:यह संपूर्ण रिपोर्ट ग्राम वासियों की बातचीत पर तैयार की गई है।

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