BY-PRATHAM KUMAR NIGAM

किसी व्यवस्था को सुचारू एवं सतत रूप से संचालित करने के लिए एक सामाजिक समझौते का वहां की जनता एवं सत्ता के बीच होना अनिवार्य है। ये वो स्तम्भ है जिससे उस राष्ट्र एवं नागरिको के चहुमुखी विकास के पथ को प्रगति प्रदान होती है।

 जिस प्रकार वर्तमान समय में लोगों के अंदर एक उपभोगी होने के गुण ने जन्म लिया है। वैसे-वैसे इस सामाजिक समझौते के स्तम्भ की नींव भी कमजोर हुई है। जिससे अपराधों का जन्मदर बढ़ता जा रहा है एवं इन अपराधों के नियंत्रण के आंचल में समाज के व्यक्तियों के अधिकार समाहित होते जा रहे हैं।

आज हम अनेक तरह के उदाहरण देख सकते हैं। वो चाहे कश्मीर हो या केरल,सोशल मीडिया हो या राजनीति,धर्म हो या स्वतंत्रता, आय असमानता हो या किसान,देश के गरीब हो या शोषित वर्ग या पूंजीपति  हर एक जगह इस सामाजिक समझौते का ह्रास ही नज़र आता है।

अब जब इन अपराधों से जन्मे परिणाम  अनेक रूपों में समाज के सामने नज़र आने लगते हैं तो इन्हें नियंत्रित करना सत्ता पक्ष की कहीं न कहीं एक जिम्मेदारी होती है। वहीं इसके नियंत्रण की प्रक्रिया में यदि मानव अधिकारों को ही प्रदूषित कर दिया जाए  तो हम राष्ट्र एवं नागरिकों के चहुमुखी विकास की प्रगति की शीतल एवं स्वच्छ हवाओं को कैसे महसूस कर पाएंगे ?

वर्तमान में सोशल मीडिया पर हम अनेक प्रकार की चर्चाओं में रुचि रखते हैं। चर्चा अफजल की फांसी की हो या कश्मीर में भारतीय सैनिक औरंगजेब की शहीदी की, बात निजता के अधिकार की हो, या उसके हनन की, बात खाने पर प्रतिबंध की हो या फिर भीड़ द्वारा की जा रही हत्या की।

आखिर कारण क्या हैं जो हम ऐसी चर्चावों को करते करते अचानक सामाजिक न्याय,आर्थिक न्याय,राजनीतिक न्याय ,वाक्य की स्वतंत्रता,अनेकता में एकता ,अखंडता ,सुरक्षा,धर्मनिरपेक्षता आदि की बात करने लग जाते हैं।तो क्या हमारे और सत्ता के बीच हुए सामाजिक समझौते को सिर्फ एक नमूना मात्र समझा जाये ?क्या जनता अपने और सत्ता अपने समझौते को लेकर असहज हो चली है?

ऐसे में जहां अपराध को नियंत्रण करना सत्ता के लिए महत्वपूर्ण है वहीं मानवाधिकारों का सुरक्षित होना नागरिको के लिए महत्वपूर्ण है। अर्थात अपराध नियंत्रण एवं मानवाधिकारों की स्थापना का उद्देश्य तो सामाजिक समझौते को ही जामा पहनाने से है। तभी तो किसी राष्ट्र के चहुमुखी विका की हम परिकल्पना कर पाएंगे।

लेखक स्वतंत्र स्तंभकार हैं। 

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