BYरवि भटनागर


आठ नवंबर, दो हज़ार सोलह में की गई नोट बंदी का दुष्प्रभाव, पूरी तरह से समाप्त होने में और कितना समय लग जायेगा, अनुमान लगाना मुश्किल है। सरकारी पक्ष और विपक्ष, दोनों ही अपने-अपने तर्क, कुतर्क देने की स्वतंत्रता का पूरा लाभ उठा रहे हैं। नेता गण, पूरे ज़ोर शोर के साथ राजनीतिक बयान बाज़ी कर रहे हैं।

कुछ प्रश्न अनुत्तरित ही रहेंगे, पर उनका उत्तर किसी न किसी के पास तो होगा ही।

1.नोटबंदी के आठ बजे के ऐलान के बाद, रात बारह बजे तक का वक्त क्यों खुला रखा गया। चार घंटे का समय, समर्थ लोगों को, क्या-क्या दे गया, जाँच करना, और साबित कर लेना भी आसान नहीं है।

2. रद्दी नोटों के बदलने का कार्य सभी बैंको को दिया गया था, फिर, को-आपरेटिव बैंको में इस कार्य पर अचानक रोक लगा दी। तब तक, इन बैंको ने, बहुत रुपया बटोरा। अधकचरे कार्य ने गाँव और कस्बों पर बहुत नकारात्मक असर डाला एसा क्यों हुआ ?

3. दो हज़ार के नये छपे नोट, ए टी एम के नाप के न हो पाने के कारण, मशीनें ठीक होने तक ठीक से चलन मेंं नहीं आ पाये, कष्ट जनता ने क्यों भुगता ?

4.उन दिनों ,दावा सुना गया कि नई करैंसी पिछले कई महीनों से छप रही है, फिर उन पर एक माह पूर्व आये आरबीआई गवर्नर के हस्ताक्षर कैसे थे ?

5. सिर्फ पचास दिन, सौ दिन, 31मार्च 2017 व अन्य सरकारी ऐलानों का औचित्य क्या था ?

6.शुरुवाती अनुमानों के विपरीत, 99.4 प्रतिशत नोटों की वापसी के अतिरिक्त काफी धन नष्ट किया गया, लोगों ने बहाया, या देश, विदेशों में अभी भी मौजूद है, ऐसा माना जा रहा है। यदि सब जोड़ लिया जाये, तो हो सकता कुल राशि 110 प्रतिशत से भी अधिक हो सकती है। अर्थ क्या निकलेगा इसका ? यानी काला धन तो सरकार साबित नहीं कर पाई, पर नकली नोट असली नोटों की भीड़ में शामिल हो गये।

जाहिर है यदि मेरे प्रश्नों का जवाब नहीं सत्ता में काबिज लोगों के पास तो यकीन मानिये सरकार अपने फैसले को सही साबित कर पाने में नाकाम रही है। आंकडों की जादूगरी, अपना मन बहला सकती है, स्थितियों को सुधार नहीं सकती।

लेखक स्वतंत्र विचारक हैं तथा गुरुग्राम में रहते हैं।

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