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BY- DR.SAEED ALAM

हमारे देश के संविधान ने अपने नागरिकों को स्वंत्रता का अधिकार देकर उसके व्यक्ति के रूप में मौलिक अधिकारों को सुरक्षित किया है ताकि वह अपना भौतिक और नैतिक विकास कर सके.

किन्तु लोगों ने स्वतंत्रता के नाम पर न जाने कैसी-कैसी आजादी की मांग की है जिसका फैसला न्यायालय को करना पड़ता है.

इसी आधार पर नाज फाउंडेशन ने भी समलैंगिक व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय में याचिका दायर की थी।

नाज फाउंडेशन के द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय में की गई अपील मैं यह फैसला आया कि-धारा 377 के तहत समलैंगिक संबंध बनाने वाले लोगों पर सख्त कार्यवाही की जाएगी.

इस तरह के संबंध पूरी तरीके से अप्राकृतिक हैं और यदि हमने इसे कानूनी तौर पर मान्यता दे दी तो इसका सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव समाज पर पड़ेगा.

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के अंतर्गत- किसी भी व्यक्ति, महिला या जानवर के साथ अप्राकिर्तिक रूप से संभोग करने वाले व्यक्ति को अपराधी माना जाता है .और ऐसा करने का दोषी पाए जाने पर उस व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा अथवा 10 वर्षों तक की कैद,साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

इस संबंध में  यदि विस्तृत अवलोकन किया जाए तो नाज फाउंडेशन का यह तर्क – क्या धारा 377 संविधान में मिले मौलिक अधिकारों अनुच्छेद 14 15 और 21 का उल्लंघन नहीं करता ? जिसमें लिंग के आधार पर हर तरह के भेदभाव पर रोक लगाई गई है ?

अतः दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में दोबारा याचिका दायर की गई. सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय का गहराई से अध्ययन किया तथा कानून को बदलने, हटाने और बरकरार रखने की जिम्मेदारी संसद को दे दिया.

आज पांच जजों की बेंच ने समलैंगिकता के सम्बन्ध में ऐतहासिक फैसला सुनते हुए कहा कि- सहमति से दो व्यक्तियों के बीच बनाये गए यौन सम्बन्ध अब अपराध के दायरे में नहीं आएंगे.

 इस फैसले से समलैंगिक व्यक्तियों में ख़ुशी की लहर है. किन्तु यह ख़ुशी अपने अंदर कई प्रश्नों को समहित किये हुए है. मसलन-भारत जैसे देश जिसकी सभ्यता और संस्कृति पुरे विश्व में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है ,जहाँ के परिवार के सद्स्यों के बीच एक अनुशसनात्मक दुरी होती है. यहाँ तक की जिन देवताओं ने अवतार लिया उन्होंने भी इस आदर्श को बनाये रखा-जैसे भगवन राम.

क्या इस तरह के फैसले हमारी सभ्यता को प्रभावित नहीं करेंगे ?

संस्कृति की रक्षा करने वाले पैरोकार – बजरंग दल,आर०यस०यस,मणसे जो विभिन्न पश्चिमी सभ्यताओं का मुखर रूप से विरोध करते हैं……… क्या अब वे शांत रहेंगे ,कोई हंगामा नहीं करेंगे ?.

आखिर आजादी के नाम हम और किन-किन चीजों की मांग रखेंगे ? भारतीय संदर्भ में यौन सम्बन्ध परदे का विषय है जो महज शारीरिक संतुष्टी के लिए ही नहीं स्थापित किये जाते बल्कि उसका धार्मिक पहलु भी पूरा होता है.

हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए की भारत यूरोप नहीं है यहाँ की भौगोलिक दशाएं ,नैतिक मूल्य और मान्यताएं सब कुछ अलग है.

हमें सीखना अगर है तो क्यों न हम पश्चिमी विज्ञान और प्रौद्योगिकी को सीखें जिससे हमारा देश भी प्रगति की उचाईयों को छुवे, हम विकसित देश बने.तथा हमारी बुनियादी जरूरतों एवं समस्याओं-गरीबी, बेरोजगारी,भुखमरी,अच्छे विद्यालयों,चिकित्सालयों का आभाव आदि को पूरा करें

एसमलैंगिक व्यक्ति भी मनुष्य हैं,उनकी भावनाओं का भी क़द्र किया जाना चाहिए. उनके लिए किसी बेहतर विकल्प की तलाश की जानी चाहिए जिससे वे भी सम्मान के साथ जी सके

वास्तव में हमें समलैंगिक व्यक्तियों की ख्वाइशों तथा भारतीय संस्कृति की रक्षा के बीच संतुलन बनाने की जरुरत है ताकि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे ।

(नोट– इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं )

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